ट्रम्प का तर्क यह है कि अमरीका ने मध्यपूर्व के इलाक़े में 7 ट्रिलियन डालर की रक़म ख़र्च कर दी मगर इसके बावजूद उन्हें अपना इराक़ दौरा गुप्त रखना पड़ता है, जब वहां जाते हैं तो युद्धक विमानों और भारी रक्षा उपकरणों के बीच में समय बिताना होता है।
ट्रम्प क्रिसमस के अवसर पर इराक़ में तैनात अमरीकी सैनिकों से मुलाक़ात के लिए पहुंचे थे। उन्हें इस बात का भी बड़ा दुख है कि इराक़ के अधिकारी उनसे मुलाक़ात के लिए तैयार नहीं हुए बल्कि कई इराक़ी अधिकारियों और नेताओं ने तो ट्रम्प की इस यात्रा की कड़ी आलोचना भी की।
ट्रम्प बुधवार को इराक़ के अलअंबार प्रांत में स्थित एनुल असद छावनी पहुंचे थे जहां अमरीकी सैनिक तैनात हैं। ट्रम्प के साथ उनकी पत्नी, कुछ सलाहकार, कुछ पत्रकार थे और वह लगभग तीन घटा वहां रुकने के बाद लौट गए।
इराक़ में इस बात पर आपत्ति जताई जा रही है कि ट्रम्प ने इराक़ की राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान नहीं किया। इराक़ के प्रधान मंत्री आदिल अब्दुल महदी के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति ट्रम्प और इराक़ी प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी की मुलाक़ात को इसलिए रद्द कर दिया गया कि मुलाक़ात के तरीक़े के बारे में दोनों पक्षों के बीच मतभेद था।
इराक़ी संसद में विदेशी मामलों के आयोग के सदस्य रामी अस्सुकैनी ने तो खुलकर अपनी आशंका जताते हुए कहा कि अमरीका ने इराक़ के बारे में बड़ी संदिग्ध और ख़तरनाक योजना बनाई है इराक़ को चाहिए कि बहुत होशियारी के साथ काम करे। उनका कहना है कि हम संसद में विदेश मंत्री को बुलाकर इराक़ में अमरीकी सैनिकों की उपस्थिति के बारे में विस्तार से बात करना चाहते हैं।
मुक़तदा सद्र की अध्यक्षता वाले अस्साएरून एलायंस का स्टैंड यह है कि ट्रम्प के इस प्रकार के दौरों की ओर से होशियार रहना चाहिए क्योंकि अमरीका को केवल अपने स्वार्थों की चिंता है। उन्होंने कहा कि अमरीकी अधिकारियों के इसी प्रकार के दौरों का नतीजा था कि आतंकी संगठन दाइश ने इराक़ की एक तिहाई भूमि पर क़ब्ज़ा कर लिया था।
हादी अलआमेरी की अध्यक्षता वाले अलबन्ना एलायंस ने कहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति का दौरा कूटनैतिक नियमों से ख़ारिज है और इससे लगता है कि इराक़ की सरकार के संबंध में अमरीका का रवैया वर्चस्ववादी है। एलायंस की मांग है कि इराक़ की सरकार इस मामले की शिकायत सुरक्षा परिषद में करे तथा विदेश मंत्रालय अमरीकी राजदूत को तलब करके आपत्ति जताए।
अगर इराक़ी राजनेताओं औ राजनैतिक दलों के बयानों पर ग़ौर किया जाए तो यह संदेश साफ़ दिखाई देता है कि इराक़ अब अपनी धरती पर न तो अमरीकी सैनिकों को देखना चाहता है और न ही वह अमरीका की मनमानी सहन करने के लिए तैयार है।
ट्रम्प अपने बयानों में बार बार कई ट्रिलियन डालर मध्यपूर्व के इलाक़े पर ख़र्च करने की जो बात करते हैं उसकी वजह यही है कि अमरीकी अधिकारियों की सोच यह है कि जब अमरीका ने इस इलाक़े पर 7 ट्रिलियन डालर की रक़म ख़र्च कर दी है तो इस पूरे इलाक़े में अमरीका की पैठ होनी चाहिए तथा इलाक़े की नीतियों का निर्धारण अमरीका की मर्ज़ी से होना चाहिए।
हालांकि ट्रम्प सहित अमरीकी अधिकारियों से यह सवाल ज़रूर किया जाना चाहिए कि यदि अमरीका ने इस इलाक़े में वाक़ई 7 ट्रिलियन डालर की रक़म ख़र्च की है तो क्या यह रक़म इस इलाके की मूल संरचना के विकास के लिए ख़र्च की गई है या अमरीका ने इस रक़म के माध्यम से क्षेत्र की जनता का नरसंहार किया है। अमरीका ने इस इलाक़े में बड़ा बजट ख़र्च करके पूरे इलाक़े को अशांति की आग में झोंकने और विभाजन के हालात पैदा करने की कोशिश की है। अमरीका ने सीरिया और इराक़ सहित क्षेत्रीय देशों को ध्वस्त और तबाह करने के लिए भारी रक़म ख़र्च की है। अतः इस मामले में स्थानीय देशों को अमरीका से यह पूछने का हक़ बनता है कि उसने इतनी बड़ी रक़म ख़र्च करके इस क्षेत्र को ध्वस्त क्यों कर दिया? बल्कि यह अमरीका की ज़िम्मेदारी बनती है कि उसने इलाक़े में जो तबाही फैलाई है उसके लिए क्षेत्र के देशों से क्षमा मांगे।
इराक़ में लाखों की संख्या में लोगों की जाने गईं और पूरे देश का मूल ढांचा ध्वस्त होकर रह गया। यह सब कुछ अमरीका की योजनाओं और साज़िशों की वजह से हुआ। यही कारण है कि केवल इस इलाक़े में नहीं बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी अमरीका से गहरी नफ़रत पायी जाती है।
ट्रम्प को यह समझना चाहिए कि अमरीका ने जो भी पैसा ख़र्च किया है वह किसी देश के पुनरनिर्माण या विकास के लिए नहीं बल्कि इलाक़ों और देशों को तबाह करने के लिए ख़र्च किया है और यही कारण है कि अमरीका के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल है।
ट्रम्प सहित अमरीकी अधिकारियों को चाहिए कि दुनिया भर में अमरीका के ख़िलाफ़ जन स्तर पर पायी जाने वाली नाराज़गी के कारणों को समझें और इन कारणों को दूर करने की कोशिश करें।